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प्रतिमा और प्रतिमान

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क्या प्रतिमाओं की सुरक्षा के प्रयास से जटिल हैं प्रतिमानों की स्थापना के प्रयास ? ..... (पुनीत शुक्ला ) महापुरूषों की प्रतिमाओं से छेड़खानी और उस पर क्रुद्ध प्रतिक्रियाओ का दौर आधुनिक भारत में चलता रहता हैं। आए दिन असामाजिक तत्व धर्म या पंथविशेष या विचारधारा विशेष के लोगो में विद्वेष फैलाने के उद्देश्य से प्रतिमाओ से तोड़फोड़ कर देते हैं। ये इनके अन्दर की संकुचित मानसिकता का परिचायक तो हैं ही साथ ही अल्प विद्वता की पुख्ता निशानी भी हैं। मेरा मानना हैं कि ऐसा इसलिए होता हैं विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र कहे जाने वाले भारत मे वैचारिक स्वतंत्रता को सुनियोजित अवसर नही हैं। प्रतिमान स्थापना के वैचारिक लोकतांत्रिक प्रयास से कही अधिक प्रतिमा स्थापना के कार्य होते जा रहे हैं। बहुत ही आश्चर्य और दुख की बात हैं कि लोकतांत्रिक संविधान को देने वाले बाबा साहेब की प्रतिमाये ही इस तरह की शर्मनाक घटनाओं का शिकार ज्यादातर हो रही हैं। आरक्षित और अनारक्षित के बीच स्वस्थ बहस , आलोचना के उचित अवसरों के उत्पन्न न कर पाने से बहस के स्थान पर विवाद और आलोचना के स्थान पर निंदा का रूप हो जाया करता हैं। बाबा साहेब ...

धर्मनिरपेक्षता एक राजनैतिक उपक्रम ???

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धर्मनिरपेक्षता और पंथनिरपेक्षता शब्दो के उपयोग का व्दन्द मात्र नही राजनैतिक स्वार्थो की पूर्ति भी हैं धर्मनिरपेक्षता पर चर्चा ........ ( पुनीत शुक्ला ) धर्मनिरपेक्षपता की चर्चाओं मे अनायास ही राजनैतिक तारतम्य तुरन्त समाहित होते चले जाते हैं। धर्मनिरपेक्षता की सही सही व्याख्या शायद किसी के लिए संभव नही हैं, इसलिए अधिक उचित होता हैं कि विवादों से बचने के लिए प्रायः पंथनिरपेक्षता शब्द का उपयोग कर लिया जाता हैं। इसका कारण यह भी हो सकता हैं कि प्राचीनतम भारतीय परम्परा के विपरीत आज भारत में धर्म को पूरा पूरा जानने के बजाय बिना जाने मानने वालो की संख्या बहुत अधिक हैं । वर्तमान में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय के अनुपालन मे रामजन्म भूमि अयोध्या में श्रीराम मन्दिर के शिलान्यास कार्यक्रम पर राजनैतिक बहस छिड़ी हुई हैं। इस राजनैतिक जमीन पर धर्मनिरपेक्षता की बात संविधान को ढाल बनाकर की जा रही हैं। ऐसा आज ही हो रहा हैं यह भी नही , भारतीय राजनीति में ऐसा सदा से होता रहा हैं पर राजनैतिक दलों और नेताओ द्वारा आमजन को अपने अनुसार समझाया अलग अलग नजरियों से गया हैं। आज औवेसी प...
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भारतीय विद्या मन्दिर काॅलेज आफ मैनेजमेन्ट एज्युकेशन, ग्वालियर एवं शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, नई दिल्ली द्वारा आयोजित राष्ट्रीय वेबिनार दिनांक 26 एवं 27 जून 2020  विषय - (भारतीय ज्ञान विज्ञान परम्परा एवं शिक्षक शिक्षा - वर्तमान स्थिति एवं सुधार के उपाय)  में मेरे आदरणीय गुरू डाॅ. राजेशजी साकोरीकर के अमूल्य वक्तव्य के लिपिबद्ध अंश  ( 7000 वर्षो से अधिक समय से सुरक्षित भारतीय ज्ञान, विज्ञान, परम्परा की निधि होने के बाद भी हम पाश्चात्य के ज्ञान , विज्ञान पर आश्रित क्यो ?  -  डाॅ. राजेश साकोरीकर) वक्तव्य ( डाॅ. राजेश साकोरीकर ) -             दुनिया की प्राचीन से प्राचीन सभ्यता जैसे यूनान, रोम आदि सब विलुप्त हो  गई लेकिन भारतीय परम्परा 7000 वर्षो से भारतीय ज्ञान, विज्ञान और परम्परा के कारण हमे सुरक्षित दिखाई देती हैं । मैं अब शिक्षक शिक्षा की बात करू तो वास्तव में वर्तमान में शिक्षक शिक्षा पाश्चात्य का अनुसरण किए हुए हैं । शिक्षा मनोविज्ञान की बात करे, शिक्षण की विधियों की बात करे, अधिगम की बात करे , अधिगम के सिद्धा...

पंचकोषीय अवधारणा

‘‘ चरित्र निर्माण और व्यक्तित्व विकास ‘‘ आज का विषय एक प्रकार से हमारी शिक्षा का आधारभूत विषय हैं। शिक्षा का लक्ष्य स्वामी विवेकानंद ने यही बताया था। हमारे सभी महापुरूषों महात्मा गाॅधी, रविन्द्रनाथ टैगोर आदि सभी ने शिक्षा में इस विषय पर जोर दिया । पर आधुनिक भारत में इसी बात की कमी दिख रही हैं। आज विश्व में जो भी समस्यायें हैं उसका कारण चरित्र अवमूल्यन ही हैं । भारत भौतिक दृष्टि से तो बहुत आगे बढ़ रहा हैं परन्तु भौतिक विकास भारत के सही विकास का मापदण्ड नही हो सकता , पश्चिमी देशों में हो सकता हैं।  स्वामी विवेकानंद जब विदेश गए तो उनके पहनावे को देखकर विदेशी लोग मजाक कर रहे थे तो स्वामीजी ने कहा आपके यहाॅ व्यक्तित्व पहनावे से आंका जाता हैं जबकि हमारे यहाॅ व्यक्तित्व चरित्र से आंका जाता हैं। भौतिक विकास भी चरित्र पर निर्भर हैं । व्यक्ति,देश, समाज का विकास एक दूसरे से जुड़ा हुआ हैं इन सबका आधार व्यक्ति का व्यक्तित्व हैं।  व्यक्ति का समग्र विकास और चरित्र निर्माण ही शिक्षा का मूल लक्ष्य हैं। यदि लक्ष्य ही हमारे संज्ञान में नही हो तो पहुॅचने की या प्रयत्न को सही दिशा नही मिलती हैं। ...