भारतीय विद्या मन्दिर काॅलेज आफ मैनेजमेन्ट एज्युकेशन, ग्वालियर एवं शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, नई दिल्ली द्वारा आयोजित राष्ट्रीय वेबिनार दिनांक 26 एवं 27 जून 2020 
विषय - (भारतीय ज्ञान विज्ञान परम्परा एवं शिक्षक शिक्षा - वर्तमान स्थिति एवं सुधार के उपाय) 

में मेरे आदरणीय गुरू डाॅ. राजेशजी साकोरीकर के अमूल्य वक्तव्य के लिपिबद्ध अंश 

(7000 वर्षो से अधिक समय से सुरक्षित भारतीय ज्ञान, विज्ञान, परम्परा की निधि होने के बाद भी हम पाश्चात्य के ज्ञान , विज्ञान पर आश्रित क्यो ? - डाॅ. राजेश साकोरीकर)


वक्तव्य ( डाॅ. राजेश साकोरीकर ) -
            दुनिया की प्राचीन से प्राचीन सभ्यता जैसे यूनान, रोम आदि सब विलुप्त हो  गई लेकिन भारतीय परम्परा 7000 वर्षो से भारतीय ज्ञान, विज्ञान और परम्परा के कारण हमे सुरक्षित दिखाई देती हैं । मैं अब शिक्षक शिक्षा की बात करू तो वास्तव में वर्तमान में शिक्षक शिक्षा पाश्चात्य का अनुसरण किए हुए हैं । शिक्षा मनोविज्ञान की बात करे, शिक्षण की विधियों की बात करे, अधिगम की बात करे , अधिगम के सिद्धान्तों की बात कर ले, मूल्यांकन की पद्धतियों की बात कर ले, स्कूल इन्टर्नरशिप प्रोग्राम की बात करे हम सब पाश्चात्य की नकल कर रहे हैं । भारतीय परिप्रेक्ष्य में यदि पाश्चात्य का पहनावा होगा तो स्वाभाविक रूप से हम जोकर तो कहलायेगे ही , पाश्चात्य का ज्ञान लेने में हमें परहेज नही , हम यह तो नही कह रहे हैं कि हम पाश्चात्य का ज्ञान न ले । लेकिन मैं पूछना चाहता हूॅ मेरी अपनी जन्मभूमि, मेरी अपनी मातृभाषा,मेरी अपनी गुरूकुल परम्पराओ को ताक पर रखकर यदि मैं इस ओर जाता हूॅ तो मेरा वैचारिक विरोध स्पष्टतः सामने हैं । वेदो, और भगवत गीता में संज्ञानात्मक पक्ष है। रामायण और महाभारत में सामाजिक पक्ष हैं । सुश्रुत और आयुर्वेद में हमारे विज्ञान का पक्ष हैं । परम्पराओं, संस्कृतियों, संस्कारों और दादा दादी की कहानियों में हमारा राष्ट्रीय पक्ष हैं । यदि ये सब हमारे पास हैं तो फिर हम पाश्चात्य का आवरण क्यो पहने ? भारतीय ज्ञान विज्ञान की परम्परा को शिक्षक शिक्षा में यदि हम समाहित कर पायेगे तो स्वाभाविक रूप से आदर्श शिक्षक की कल्पना अंदर आ जायेगी । मैने पहले भी कहा हमे पाश्चात्य से परहेज नही हैं पर जब फ्रायड का मनोविश्लेषणात्मक सिद्धान्त मैं पढ़ाने बैठता हूॅ तो मुझे लगता हैं कि गरूड़ पुराण में और दत्तात्रेय भगवान की पोथी में ये सब पहले से दिया हुआ हैं । पियाजे का संज्ञानात्मक विकास जब पढ़ाने बैठता हूॅ तो मुझे लगता हैं कि भाारतीय परिवारों के लालन पालन के जो परम्परावादी तरीके हैं उसमें पियाजे खुद बैठा हुआ हैं , इरिक्सन के मनोसामाजिक सिद्धान्त की जब बात करते हैं तो दादा दादी द्वारा बच्चो को और घर की बहुओं को दी गई नसीहते इरिक्सन में दिखती हैं । इरिक्सन के सिद्धान्त का पहला पद हैं विश्वास बनाम अविश्वास , तो दादा दादी बच्चे के रोने पर कहते हेैं कि बच्चे को गोद में लो वह रो रहा हैं तो ये ही तकनीकि भाषा में विश्वास बनाम अविश्वास हैं । व्यक्तित्व का निर्माण - गीता जैसा महान ग्रंथ जिसमें व्यक्तित्व स्वयं ही दिया हुआ हैं । बच्चों में आत्मविश्वास पैदा करना हैं तो हनुमान और जामवंत के पदो को आप पढ़े जिन्होने हनुमान को सागर पार करवा दिया। एक लाईन जो हर व्यक्ति पढ़ता हैं ‘‘ आपन तेज सम्हारो आपे, तीनो लोक हांकते कांपे ‘‘ किशोरावस्था में आप क्या अधिक पढ़ाओंगे किशोरावस्था की वास्तविक स्थिति का अभिप्राय तो इसमें खुद ही दिया हुआ हैं । और वास्तव में भारतीय युवाओं से तीनों लोक काॅप भी रहे हैं क्योकि आई.टी. सेक्टर हमारे पास हैं । तो कहने का मतलब यह कि क्या नही हैं भारतीय ज्ञान, विज्ञान और परम्परा में । क्या शिक्षक शिक्षा के पाट्यक्रम में इतनी भी जगह नही है कि हम इन सारी चीजो को स्थान दे सके और यदि नही दे पा रहे तो बहुत स्पष्ट रूप से मैं यह कहूगा कि हमारे दिल और दिमाग में जगह नही हैं उसके कारण शिक्षक शिक्षा में हम इन चीजों को नही ला पा रहे हैं। मूल्यांकन पद्धति की मैं बात करता हॅू वर्तमान प्रचलित मूल्यांकन पद्धति छात्रों और शिक्षकों में भ्रम पैदा करने वाली हैं । मैं फिर से प्राचीन भारतीय परम्परा की बात करता हूॅ कि - अर्जुन और एकलव्य सामाजिक जीवन जीने के लिए तैयार हैं यह तय कौन करेगा ? गुरू द्रोणाचार्य । श्रीकृष्ण 64 कलाओं में पारंगत हो गए हैं या नही ये कौन तय करता हैं ये गुरू सांदिपनी तय करते हैं । तो गुरू द्रोणाचार्य और गुरू सांदिपनी यानि मूल्यांकन की व्यष्टि व्यवस्थाऐें , इसको हम बोलते हैं Micro Evaluation made by Teacher who teach students कहने का मतलब माइक्रो एवेल्युशन व्यक्तिगत स्वरूप का इस भारतीय पद्धति में रहा हैं । उस मूल्यांकन पद्धति को हम क्यों नही ला पा रहे हैं । आज की मूल्यांकन पद्धति में ज्ञानात्मक अभिवृद्धियों का आंकलन तो सटिक हो जाता हैं किन्तु अन्य मूल्यांकन सटिक हो यह आवश्यक नही क्योकि वर्तमान में शिक्षक प्रशिक्षक ज्ञानात्मक मूल्यांकन व्यवस्थित न करके आंतरिक और प्रायोगिक में इतने अंक दे देते हैं कि दूसरे छात्रों में रोष उत्पन्न हो जाता हैं । इसका कारण क्या हैं ? शिक्षक प्रशिक्षको के द्वारा विभन्न प्रकार के आर्थिक आधार, सामाजिक वर्चस्वता , जातिगत आधार को मानकर मूल्यांकन करना । यदि हम विभिन्न विश्वविद्यालयों में आंतरिक मूल्यांकन और बाहय मूल्यांकन में तुलनात्मक शोध कार्य करे तो हमे पता चलेगा कि गुरू द्रोणाचार्य और गुरू सांदिपनी बनाने में हमें अभी तकलीफ हैं क्योकि यह अन्तर बहुत ज्यादा हैं । 
मैं एक और तथ्य पर बात करूगा वर्तमान में हम मूल्यो की गिरावट को लेकर सामान्य चर्चा में बात करते हैं इसका कारण हैं मूल्यों को पाठ्यपुस्तक और विषयों में ढूढते हैं और उससे मूल्य सीखाने का प्रयास करते हैं । मूल्य का जहाॅ तक प्रश्न हैं मूल्य न तो सिखाये जाते हैं, न ही पढ़ाये जाते हैं मूल्यों का केवल समावेशन करते हैं । तो मूल्यों का समावेशन कैसे करे ? मेरे पूर्व वक्ताओं ने पंचकोशीय की बात करी हैं , पंचकोशीय अवधारणा की समझ पैदा करना मूल्य हैं, और उसका व्यावहारिक स्वरूप में उपयोग करना मूल्यों का समावेशन हैं । 
भारतीय खान पान की चर्चा में शारीरिक मूल्य समाहित हैं, उसे भी क्रियान्वित कर दिया जाये तो बच्चे में समावेशन आ जायेगा। इस कोरोना की महाबिमारी ने पिछले 80 दिनों में परिवारों का खानपान सुधार दिया हैं और वे स्वस्थ भी दिख रहे हैं । यानि स्वास्थ्य के मूल्य को इस कोरोना ने लोगो को स्वयं ही दे दिया। ये मूल्यों का समावेशन करना हुआ । ये कोरोना की सकारात्मकता हैं Take one get one free अर्थात् कोरोना ने आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी ये दो मूल्य एक साथ परिवारों को दे दिये हैं । 
इसके आगे मैं शिक्षा की प्रक्रिया पर बात करना चाहूगा , पाश्चात्य स्वरूप की शिक्षा प्रक्रिया हम अपनाये हुए हैं ।  हम 3 R की बात करते हैं Reading , Writing and Arthmatic - आज हम उस पर टिके हुए हैं । भारतीय दर्शन को आत्मसात करते हुए महात्मा गाॅधी ने शिक्षा की प्रक्रिया को तीन H के लिए बोला हैं जो कि 
1. Hand -psychomotor domain/skills, 
2. Heart-spiritual domain/skills और 
3.Head-Cognitive domain/skills  इस रूप में समझते हैं। इसे हम पाश्चात्य का झुकाव होने के कारण हम इसे अपना नही पाये । चलिए इसे छोड़िए चाणक्य के तीन H पर बात करते हैं उन्होन बहुत अच्छा तीन एच सूत्र दिया हुआ था उन्होने कहा था - 
1. पहले पाॅच साल तक बच्चे को खुब प्यार , स्नेह, दुलार करो इतना उसे दो कि किंचित रूप से भी उसमें आत्मदुररता न आये यानि वह अपने भाई बहन, आसपास , समाज से अपने आप जुड़ जायेगा ,
 2. 6-18 वर्ष तक कड़े अनुशासन में रखो उसके बाद 
3. उसे अपना मित्र बना लो । 
यही Head , hand and Heart  हैं ।
हमारे एक बड़े साथी गुरू हैं स्वामीनाथ पाण्डेय बहुत सरल तरीके से कहते हैं शिक्षक को दिमाग से नही दिल से पढ़ाओं तो अपने आप ज्ञान का समावेश हो जाएगा । मैं अब अपने अंतिम बिन्दु की ओर जा रहा हूॅ । शिक्षक शिक्षा की वर्तमान स्थिति और सुधार अध्यापक शिक्षा का कार्यक्रम जढ़वत, निरस, निष्प्राण दिखाई देता हैं और इसके कारण हैं शिक्षक प्रशिक्षको का मशीन सदृश्य व्यवहार, अध्ययन की विविधता, अमनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण, नवाचारों से विमुखता, और अभिप्रेरणा का निम्न स्तर। मैं स्वयं भी शिक्षक प्रशिक्षक हूॅ परन्तु मैं मानता हूॅ कि अभी कुछ कमियाॅ हैं और इनमें सुधार की संभावना हैं । अब सुधार कैसे करे इसके संबंध में ये कुछ बिन्दु रखना चाह रहा हूॅ - 
1. शिक्षक प्रशिक्षको की चयन प्रक्रिया को बेहतर किया जाये।
2. शिक्षक प्रशिक्षकों की जवाबदारी का मानक मानदण्ड दिया जाये ।
3. शिक्षक प्रशिक्षकों की योग्यता एवं कार्यनिष्ठा ।
4. शिक्षक प्रशिक्षकों की व्यावसायिक ईमानदारी का बीच बीच में मूल्यांकन होते रहना चाहिए।


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