पंचकोषीय अवधारणा


‘‘ चरित्र निर्माण और व्यक्तित्व विकास ‘‘

आज का विषय एक प्रकार से हमारी शिक्षा का आधारभूत विषय हैं। शिक्षा का लक्ष्य स्वामी विवेकानंद ने यही बताया था। हमारे सभी महापुरूषों महात्मा गाॅधी, रविन्द्रनाथ टैगोर आदि सभी ने शिक्षा में इस विषय पर जोर दिया । पर आधुनिक भारत में इसी बात की कमी दिख रही हैं। आज विश्व में जो भी समस्यायें हैं उसका कारण चरित्र अवमूल्यन ही हैं । भारत भौतिक दृष्टि से तो बहुत आगे बढ़ रहा हैं परन्तु भौतिक विकास भारत के सही विकास का मापदण्ड नही हो सकता , पश्चिमी देशों में हो सकता हैं। 
स्वामी विवेकानंद जब विदेश गए तो उनके पहनावे को देखकर विदेशी लोग मजाक कर रहे थे तो स्वामीजी ने कहा आपके यहाॅ व्यक्तित्व पहनावे से आंका जाता हैं जबकि हमारे यहाॅ व्यक्तित्व चरित्र से आंका जाता हैं। भौतिक विकास भी चरित्र पर निर्भर हैं । व्यक्ति,देश, समाज का विकास एक दूसरे से जुड़ा हुआ हैं इन सबका आधार व्यक्ति का व्यक्तित्व हैं।  व्यक्ति का समग्र विकास और चरित्र निर्माण ही शिक्षा का मूल लक्ष्य हैं। यदि लक्ष्य ही हमारे संज्ञान में नही हो तो पहुॅचने की या प्रयत्न को सही दिशा नही मिलती हैं। अभी हमको शिक्षा का लक्ष्य ही स्पष्ट नही हैं । अभी हम शिक्षा को केवल नौकरी के लिए ज्यादा लक्षित करते हैं। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए कि वो केवल नौकरी हेतु लाईन में न खड़ा हो बल्कि वह स्वयं आवश्यकता होने पर अन्य लोगो को नोैकरी देने वाला बने। हमारे यहाॅ पंचकोश कहे गए हैं - 
1. अन्नमय कोष 2. प्राणमय कोष 3. मनोमय कोष 4. विज्ञानमय कोष 5. आनंदमय कोष
उक्त कोषो के आधार पर विकास होता हैं तो व्यक्ति का समग्र विकास होता हैं । सभी प्राणियों में व्यक्ति ही ऐसा होता हैं जो स्वयं को व्यक्त करता हैं इसी से उसका नाम व्यक्ति पड़ा हैं। 
अन्नमय कोष  - 
हमारे देश में व्यक्तित्व विकास के संबंध में प्राचीन समय से ही धारणा रही हैं एवं व्यक्ति के बाहरी एवं आंतरिक व्यक्तित्व के विकास के विचार होते रहे हैं। पंचकोष का उल्लेख त्रेत्रीय उपनिषद् में आया हैं। पंचकोष के माध्यम से व्यक्ति कैसे अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकता हैं इस बारे में विचार करना चाहिए । आज पर्सनाॅलिटी डेवेलपमेंट की बात होती हैं तो बाहरी चीजो पर अधिक जोर दिया जाता हैं जबकि आंतरिक चीजो पर नही । उपनिषद् मे भी यह बात कही गई कि मनुष्य एकमात्र प्राणी हैं जिसमें अन्नमय कोष की अपेक्षा प्राणमय कोष, मनोमय कोष अधिक सक्रिय रहता हैं। अन्नमय कोष अन्न के माध्यम से तैयार होता हैं इसलिए हम कह सकते हैं कि हमारा शरीर अन्नमय हैं । हमको खानपान , आहार में विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती हैं इसमें असावधानी रखने पर शरीर अस्वस्थ हो जाता हैं। स्वस्थ रहना और अस्वस्थ होना प्राकृतिक हैं? हमारे शरीर की रचना इस प्रकार की हैं कि हम नैसर्गिक रूप से भी स्वस्थ रह सकते हैं । हमारे शरीर में 9 द्वार और 8 चक्र हैं , हमारे शरीर को स्वस्थ रखने की पुख्ता व्यवस्था प्रकृति ने की हैं।  आयुर्वेद में कहा गया हैं शरीर को स्वस्थ रखने हेतु - दिनचर्या, ऋतुचर्या, रात्रिचर्या इन तीन बातेां का विशेष ध्यान रखना पड़ेगा। इसमें सावधानी की आवश्यकता होती हैं। शरीर के दो भाग - बाहय एवं आंतरिक हैं। हर व्यक्ति शरीर को सबल, सुडौल, लोचपूर्ण, तेजस्वी बनाना चाहता हैं। इसको ठीक रखने के लिए कही न कही हमको अपने शरीर पर ध्यान देने की अवश्यकता रहती हैं। स्वस्थ रहने के लिए दिनचर्या यानि प्रातःकाल उठने से लेकर रात्रिविश्राम तक ध्यान देना चाहिए। आज हर पालक बच्चे के नौकरी में अच्छे पैकेज की चिंता करता हैं लेकिन उसके स्वास्थ्य के अच्छे पैकेज की चिंता नही करता । क्या हम देखते हैं कि बालक खेल, व्यायाम,योग आदि करता हैं या नही ? हमारे शरीर को नियमित रूप से इनकी आवश्यकता होती हैं। इससे शरीर सुडौल, ओजपूर्ण, मजबूत बनता हैं। आज का बच्चा हम देख रहे हैं इन चीजो से बहुत दूर हटता जा रहा हैं और मोबाईल के ज्यादा करीब हो रहा हैं। विद्यार्थियों के निकट जाकर उनकी दिनचर्या को समझकर उसे उसकी दिनचर्या और शरीर के प्रति सजग करना होगा।

दूसरी बात ऋतुचर्या की करते हैं। हमारा आहार व्यवहार ऋतु के अनुसार होना चाहिए। हम तीन प्रकार के आहार ग्रहण करते हैं - वायु, जल और अन्न। अभी लाॅकडाउन में प्राकृतिक वातावरण निखर गया था। शुद्ध वायु, शुद्ध जल की आवश्यकता स्वस्थ शरीर को होती हैं। अन्न के बारे में कब खाना, कितना खाना इस पर विचार करना चाहिए और ऋतुओं के अनुसार फल, सब्जियो का उपयोग करना चाहिए। घर के बड़े को इस ओर सजग होना चाहिए ताकि बच्चे भी अनुकरण से सही खानपान रखे। स्वामी विवेकानंद ने कहा हैं कि विद्यार्थियों को खुब खेलना चाहिए। किसी शिक्षाविद् ने कहा हैं कि पढ़ते समय में खेलो, और खेलते समय में पढ़ो। शिक्षा एक आनन्द का विषय हैं। आज विद्यार्थी पढ़ते समय आनन्द की अनुभूति नही करता हैं। एकाग्रता विषय के प्रति रूचि उत्पन्न करती हैं एवं आनन्द की अनुभूति भी होती हैं । शरीर को स्वस्थ रखने के लिए तनावमुक्त होना बहुत जरूरी हैं। यह काम आज की परिस्थिति में बहुत कठिन हैं। आज की शिक्षा प्रणाली ऐसी हो गई हैं कि बच्चों में प्रारम्भ से ही तनाव की भावना आने लगती हैं। हमें कोशिश करनी चाहिए कि तनाव समाप्त नही हो तो कम से कम अधिक से अधिक कम किया जा सके । जंकफुट शरीर को किस प्रकार से नुकसान पहुॅचाते हैं इससे बच्चे को अवगत कराना और संयमित आहार की शिक्षा देना चाहिए । प्राचीनकाल मे संयम पर बहुत अधिक जोर दिया जाता था। शरीर के बाहरी अंग व्यवस्थित रूप से कार्य करे, लयबद्धता आये इससे कुशलता बढ़ती हैं। इसके साथ निरामयता की आवश्यकता होती हैं। हमारे आंतरिक अंग फेफड़े, हृदय आदि ठिक रहे इसकी भी चिंता करनी चाहिए। तितिक्षा यानि विपरित परिस्थितियों में भी सहनशक्ति रखना बढ़ाने की कोशिश करना चाहिए। आज सहनशक्ति कम होती जा रही हैं जिससे रोग बढ़ रहे हैं। हम अपने विद्यालय, महाविद्यालय में जो शिविर, खेल गतिविधि आदि आयोजित करते हैं उसमें विद्यार्थियों के निकट जाकर सुसंवाद स्थापित करते हैं तो उसके अच्छे परिणाम आयेगे। श्रम के महत्व को भी विद्यार्थियों को समझाना चाहिए। जैसे - स्कूल में सामूहिक भोज में परोसने का कार्य देना, घर में बच्चों से उनकी क्षमता अनुसार आवश्यक कार्य करवाना। शरीर से विचार नही बनते बल्कि विचार से शरीर बनता हैं। अच्छी आदतों से अच्छा चरित्र बनता हैं। विद्यार्थियों को छोटी छोटी अच्छी बाते शुरू से ही सीखाना चाहिए। विद्यार्थी अपने शरीर के चहुमुॅखी विकास के प्रति जागरूक रहे ऐसा प्रयास करते रहना चाहिए। ये सभी छोटी छोटी बाते विद्यार्थी के साथ हम सबको भी अपनानी चाहिए। क्योकि विद्यार्थी देखकर के जल्दी सीखता हैं बजाय कहकर सीखने के। बाहरी एवं आंतरिक शरीर को स्वस्थ रखने की पूरी व्यवस्था प्रकृति ने कर रखी हैं हमें केवल सावधानी व सजगता रखने की जरूरत होती हैं । 

प्राणमय कोष - 

प्राणमय कोष के बारे में बात करने से पहले योग की चर्चा उपयुक्त होगी । योग को हम अलग तरीके से देखते हैं , योग आम जनधारणा से बहुत अलग हैं। योग के बारे में आम धारणा हैं कि योग एक प्रकार की कसरत हैं , पर योग और शारीरिक व्यायाम मेें जमीन आसमान का अंतर हैं । योग में सम्पूर्णता होती हैं जबकि शारीरिक व्यायाम केवल एक पक्ष पर कार्य करता हैं । योग मन, विचार, शरीर सभी पर कार्य करता हैं। योग चेतना, आत्मा, दृष्टिकोण सबको बदलने की क्षमता रखता हैं। योग जीवन को जीने की शैली सीखाता हैं। योग जीवन को समझने का एक दृष्टिकोण देता हैं । गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा हैं - 
‘‘ न कर्मणामनारंभान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।
न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति।। ‘‘
अर्थात् मनुष्य न तो कर्मों का आरंभ किए बिना निष्कर्मता (जिस अवस्था को प्राप्त हुए पुरुष के कर्म अकर्म हो जाते हैं अर्थात फल उत्पन्न नहीं कर सकते, उस अवस्था का नाम निष्कर्मता है ) को यानी योगनिष्ठा को प्राप्त होता है और न कर्मों के केवल त्यागमात्र से सिद्धि यानी सांख्यनिष्ठा को ही प्राप्त होता है ।
संक्षेप में गीता के अनुसार समभाव से कर्म करना ही योग हैं। 
स्वामी विवेकानंद ने योग के बारे में कहा हैं - ‘‘ योग किसी भी एक व्यक्ति के जीवन में होने वाली एक ऐसी घटना या क्रान्ति हैं जो कुछ महीनों में, कुछ घंटों में या कुछ पलों में घटित हो सकती हैं और जिसे शारीरिक अस्तित्व के रूप में महसूस कर सकते हैं ‘‘ 
महर्षि पतंजलि ने और गीता में भी योग के बारे में कहा गया हैं। योग स्वयं को समझने में भी मदद करता हैं।
 हमारा शरीर पाॅच कोष से बना हैं।  ये कोष बाहर से अन्दर की ओर क्रमशः होते हैं। इन्हे अन्दर से बाहर के रूप में ऊर्जा स्तरेां के रूप में समझा जा सकता हैं। 
1- अन्नमय कोष - भौतिक शरीर
2- प्राणमय कोष - श्वास/उर्जा शरीर
3- मनोमय कोष - भावनायें/मानसिक शरीर
4- विज्ञानमय कोष - बुद्धि शरीर
5- आनंदमय कोष - परमानंद शरीर
अब  प्राणमय कोष पर चर्चा करते हैं , हमारे शरीर में प्राण होता हैं , जब किसी की मृत्यु होती हैं तो हम कहते हैं कि प्राण निकल गए। हमारे शरीर में एक ऐसा ऊर्जा का पुंज होता हैं जिससे हमारे शरीर का संचालन होता हैं और हमें जीवित रखता हैं। इस ऊर्जा के निकलते ही हमारा शरीर अन्य ऊर्जाओं के होते हुए भी कार्य नही कर सकता। प्राणमय कोष को समृद्ध करना हो तो हमें श्वास पर ध्यान देना होगा। हमारे शरीर के प्राण को पंचप्राण के रूप में पाॅच प्रकारों में बाॅटा गया हैं ।
1. अपान - शरीर में इस प्राण का बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान हैं। अपान शरीर से दूषित पदार्थो को बाहर निष्काषित करने का काम करता हैं। इस प्राण की क्रियाशीलता की वजह से ही शरीर से मलमूत्र ,कफ,रज आदि का विसर्जन सम्पन्न होता हैं। प्रसव क्रिया भी इसी प्राण के माध्यम से पूरी होती हैं।
2. समान - इस प्राण का काम शरीर में निर्मित होने वाले विभिन्न रसों को सही स्थान पर ले जाना हैं। यह पाचक रस समेत सभी आवश्यक तरल पदार्थो को सही स्थान पर ले जाने और वितरित करने का काम करते हैं। समान प्राण के द्वारा ही शरीर की ऊर्जा और सक्रियता ज्वलंत रखी जाती हैं।
3. प्राण - प्राण का काम शरीर के लिए साफ, स्वच्छ वायु को श्वास के रूप मंे खंींचना हैं और शरीर में बल को संचारित करता हैं।यानि कि प्राण से ही शरीर को असलियत में प्राण मिलते हैं।
4. उदान - यह शरीर को कड़क बनाए रखने और उठाए रखने का काम करता हैं। यानि यह आपको खड़े रहने की शक्ति प्रदान करता हैं। यही प्राण गर्दन और सिर को नियंत्रित करके आपको गिरने नही देता हैं। बाहरी नकारात्मक शक्तियो के बीच शरीर को स्थिर खड़ा रखने का काम उदान नामक प्राण ही करता हैं।
5. व्यान - यह शरीर में रक्त संचार, श्वास, ज्ञान तंतु को बनाए रखने का काम करता हैं। प्राण के इसी प्रकार की वजह से आपका दिमाग संचालित होता हैं। जीवन से जुड़े अहम फैसले करने की क्षमता आपको व्यान ही देता हैं । 
उक्त पाॅचो प्राणों के अलावा निम्न उपप्राण भी हैं - 
1. नाग उपप्राण - यह पेटदर्द और हिचकी के लिए उत्तरदायी होता हैं। इसके अलावा जब मनुष्य को क्रोध आता है तब यह प्राण क्रोध से उत्पन्न विष को उगल देता है । तथा शरीर मे मोजूद अमृत को भस्म कर देता है । शरीर मे क्रोध नाग प्राण के कारण उत्पन्न होता है ।
2. कूर्म उपप्राण - इस उपप्राण का संबंध अपान प्राण से होता है । इस उपप्रन का कार्य शरीर मे गुरुत्वाकर्षण बल को उत्पन्न करना होता है । इस बल से शरीर की एकाघ्रता होती है । जब मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होता है तो सबसे पहले कूर्म उपप्राण अपना कार्य छोड़ देता है ।
3. क्रकल उपप्राण - यह भूख, प्यास, छिंकने और खासी के लिए उत्तरदायी होता हैं । इस उपप्राण का संबंध समान प्राण के साथ होता है । उचित मात्रा मे ऊर्जा बिटामिन और रसो की आपूर्ति यह उपप्राण करता है । साधना के लिए इस उपप्राण को मजबूत बनाना आवश्यक है ।
4. देवदत्त उपप्राण - यह प्राण व्यान प्राण का उप प्राण है । इस उपप्राण का संबंध लोक लोकांतरों से होता है । जब मनुष्य समाधि मे जाता है तो देवदत्त प्राण ही विभिन्न लोको से संबंध स्थापित करता है । इसका संबंध ज्ञान की धाराओं से होता है ।
5. धनंजय उपप्राण - इस उपप्राण का संबंध उदान प्राण से होता है । उदर मे होने वाली क्रियाओं का संपर्क धन्जय उपप्राण से होता है । स्वस्थ रहने के लिए धन्जय मजबूत रहना चाहिए । धनंजय उपप्राण मृत्यु के बाद कार्य करता हैं और शरीर के विघटन और क्षय को नियंत्रित भी करता हैं।
हमारे शरीर के स्वस्थ रहने के लिए उक्त प्राणो का निर्बाध रूप से प्रवाहित होना जरूरी हैं। इस हेतु प्राणायाम रचित किए गए हैं। कुछ प्राणायाम प्राचीन योगियों ने रचित किए कुछ बाद में बने। आसनो के बाद/ऊपर प्राणायाम रखे गए हैं। योग के विभिन्न अंग अष्टांग योग के रूप मे बताए गए हैं । जिसमे प्राणायाम में चैाथे स्तर पर कार्य करता हैं -
1 यम
2 नियम
3 आसन
4 प्राणायाम
5 प्रत्याहार
6 धारणा
7 ध्यान
8 समाधि

प्राणायाम के चार पहलू / सामान्य प्रकार होते हैं, जिनका विवरण निम्नानुसार हैं -

1. pooraka - Inhalation 2. Kumbhaka - Retention

3. Rechaka - Exhalation 4. Shunyaka - Suspension


(1) पूरक- अर्थात नियंत्रित गति से श्वास अंदर लेने की क्रिया को पूरक कहते हैं। श्वास धीरे-धीरे या तेजी से दोनों ही तरीके से जब भीतर खिंचते हैं तो उसमें लय और अनुपात का होना आवश्यक है।
(2) कुम्भक - अंदर की हुई श्वास को क्षमतानुसार रोककर रखने की क्रिया को कुम्भक कहते हैं। श्वास को अंदर रोकने की क्रिया को आंतरिक कुंभक और श्वास को बाहर छोड़कर पुनरू नहीं लेकर कुछ देर रुकने की क्रिया को बाहरी कुंभक कहते हैं। इसमें भी लय और अनुपात का होना आवश्यक है।
(3) रेचक - अंदर ली हुई श्वास को नियंत्रित गति से छोड़ने की क्रिया को रेचक कहते हैं। श्वास धीरे-धीरे या तेजी से दोनों ही तरीके से जब छोड़ते हैं तो उसमें लय और अनुपात का होना आवश्यक है।
(4) शुन्यका प्राणायाम - लंबे समय तक निलंबन। इस प्राणायाम में, पूरी साँस छोड़ने के बाद, सांस को निलंबित कर दिया जाता है।
प्राणायाम के अलग अलग प्रकारों में किसी को लंबा तो किसी को छोटा करते हैं। 
प्राणायम के लाभ -
प्राणायाम एकाग्रता बनाने के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। एक स्थान पर और शांत बैठना आजकल बच्चों में दिखाई नही देता । ये सारी चीजे हम बच्चों में योग, आसन, प्राणायाम से ला सकते हैं। योग और प्राणायाम से भौतिक चीजो की इच्छायें अपने आप कम होने लगती हैं। अपनी तुलना दूसरो से कम करने लगते हैं। प्राणायाम ऊर्जा बढ़ाते हैं, सकारात्मकता बड़ती हैं, रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ती हैं। कोरोना काल में प्राणायाम बहुत महत्वपूर्ण बन गया हैं। 
अनुलोम विलोम बहुत सामान्य प्राणायाम हैं जो हर व्यक्ति कर सकता हैं और करना चाहिए। यह नाड़ीशोधन प्राणायाम होकर रामबाण प्राणायाम हैं जो बहुत से रोगो की संभावना कम करता हैं और रोगो को खत्म भी करता हैं। यह नाड़ी शोधन कर नाड़ीयों को संतुलित कर शरीर को संतुलित करता हैं। यह हर किसी को करना चाहिए। 
ब्राहमरी प्राणायाम इकलौता ऐसा प्राणायाम हैं जिससे ब्रेन के न्यूरोन सक्रिय होते हैं। यह विद्यार्थियो के लिए बहुत अच्छा प्राणायाम हैं। एक रिसर्च के मुताबिक सामान्यतः हम अपने मस्तिष्क का 5 प्रतिशत उपयोग ही करते हैं लेकिन इस प्राणायाम से हम इस उपयोग को 10 प्रतिशत तक ले जा सकते हैं। 
कपालभारती प्राणायाम भी बहुत अच्छा प्राणायाम हैं । यह पेट के लिए अच्छा तो हैं ही साथ ही इससे हमारी त्वचा भी अच्छी होती हैं।
उज्जायी प्राणायाम भी बहुत अच्छा प्राणायाम हैं। इससे ध्वनि यंत्र का व्यायाम होता हैं और थायरायड ग्रंथि को नियंत्रित करता हैं। 
ऊँकार प्राणायाम। इसमें ऊँ जो कि एक शब्द नही नाद हैं का उच्चारण करके इसकी उच्चारण आवृत्ति को ब्रहमाण्ड की आवृत्ति से मिलान करने का प्रयास करते हैं। 
ये पाॅच प्राणायाम बच्चों के प्राणमय कोष के विकास के लिए बहुत अच्छे हैं। 
गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा हैं ‘‘ ‘योगः कर्मसु कौशलम् ‘‘ अर्थात् योग करने से कर्म में कुशलता आती हैं। योग स्वयं की यात्रा हैं इसमे बाहर की चीज से कोई लेना देना नही हैं। योग और प्राणायाम एक अनुभवजन्य विज्ञान हैं। विज्ञान में हम दूसरों पर प्रयोग करके देखते हैं जबकि इसमें प्रयोग सामग्री और निरीक्षणकर्ता दोनो हम स्वयं भी हैं इसलिए इसमे गलती की संभावना भी कम होती हैं। 

मनोमय कोष  - 

 अन्नमय कोष स्थूल हैं उसके बाद के कोष क्रमशः सूक्ष्म होते जाते हैं। हम जानते हैं कि शिक्षा का उद्देश्य मन की शांति, मन का निर्विकल्प होना हैं, शिक्षा आनंद की ओर ले जाती हैं । गीता में कहा गया हैं कि मन ही मनुष्य का शत्रु हैं और मन ही मनुष्य का मित्र हैं। हम कभी कभी अंर्तद्वन्द में उलझते हैं , कभी कभी हम वह काम करते हैं जो मन कहता हैं कभी वह कर लेते हैं जो मन नही कहता। मन के एक ओर सकारात्मक सुन्दर चित्र, दूसरी ओर नकारात्मक बुरे चित्र होते हैं इनके अनुसार हमारा सकारात्मक और नकारात्मक व्यवहार होता हैं। इसके लिए कहा गया हैं कि चित्रगुप्त इसके अनुसार हमारा चित्र बनाता हैं और अंत समय में यमराज को प्रस्तुत करता हैं । 
स्वामी विवेकानंद ने कहा हैं दुर्बलता का मुकाबला उस शक्ति से करों जो तुम्हारे अंदर पहले से मौजूद हैं।  शिक्षक से अच्छा कोई मनोवैज्ञानिक नही हो सकता ऐसा मेरा मानना हैं। पालक भी एक शिक्षक होता हैं जो बालक के चेहरे को पढ़ता, समझता हैं। यदि हम शिक्षक होकर बालक को नही समझ पाते तो हम पूर्ण शिक्षक नही हैं।  आज की शिक्षा में विद्यार्थी में तनाव, अवसाद उत्पन्न हो रहे हैं। मन की शिक्षा विषयों की शिक्षा के साथ दी जानी चाहिए ताकि बच्चा यह समझे की मन के कचरे को कैसे बाहर करे। मन को नही समझने के कारण आज समाज में आत्महत्याये बढ़ रही हैं ।
एक आचार्य ने लिखा था - अशिक्षित व्यक्ति बुराईयों मे उलझे यह समझ में आता हैं परन्तु शिक्षित व्यक्ति भी बुराईयो में उलझे और आत्महत्या जैसे काम भी कर जाये यह कैसे ? क्या शिक्षा ने यह भी नही सिखाया कि विपरित परिस्थितियों में मन पर नियंत्रण कैसे रखे। मन बहुत चंचल होता हैं यह इसकी सबसे बड़ी विशेषता हैं । मन की गति से तेज किसी की गति नही होती। मन को नियंत्रित करना आसान नही होता। मन में अच्छे और बुरे दोनो प्रकार के विचार आते हैं, आपने अनुभव किया होगा कि मन यदि कमजोर हैं , यदि यह विकसित नही हैं तो बुरे विचार पहले आते हैं। मन यदि मजबूत हैं तो मन में अच्छे सकारात्मक विचार आते हैं। मन के एक पक्ष में सकारात्मकता और दूसरे पक्ष में नकारात्मकता हैं। नकारात्मकता जल्दी आती हैं इसे नियंत्रित करना हमारे उपर निर्भर हैं ।
मन की एक और विशेषता यह द्वन्दात्मक होता हैं। हम किसी कार्य को करने जाये तो करू या नही करू दोनेा प्रकार के विचार आते हैं। मन जब कमजोर होता हैं तब द्वन्द अधिक मात्रा में महसूस होता हैं इस स्थिति में वह विज्ञानमय कोष की ओर आगे नही बढ़ पाता। 
मन की एक और सबसे बड़ी विशेषता हैं कि मन को वश में करना कठिन हैं। मन को वश में जिसने कर लिया उसने सब कुछ कर लिया। मन को वश में करने के बहुत प्रयास करने पढ़ते हैं । मन में आसक्ति और अनासक्ति दोनो होती हैं। यदि हम आसक्त अधिक हो जाते हैं तो बाद में गुस्सा आता हैं । आसक्ति कम मात्रा में ठीक हैं पर अधिक मात्रा में होने पर मन पर दुष्प्रभाव डालती हैं। मन को विकार से मन के विकास की ओर ले जाना आसान बात नही हैं। मन को विकारों से मुक्त करने के प्रयास निरंतर करने पड़ते हैं। हमे विद्यार्थियों को सीखाना होगा कि मन को शांत कैसे करे एवं स्वयं भी समझना होगा। ये विषय बहुत गहरा हैं जो वर्चुअली समझाना कठिन हैं। 
मन को शांत करने का अर्थ होता हैं मन के विकार को दूर करने की दिशा में आगे बढ़ना। ध्यान मन को शांत करता हैं । हमको लगता हैं कि ध्यान बहुत मुश्किल काम हैं। यह भी बहुत विस्तृत और गहरा विषय हैं। 
मैं सामान्य रूप में समझाता हूॅ जब हम सुबह घुमने जाते हैं तो हमें पक्षियो की चहकना,  प्राकृतिक सौन्दर्य आदि चीजे दिखाई देती हैं इनको महसूस करना भी ध्यान हैं। यदि हम भोजन करते हुए टी.वी. देख रहे हैं तो हमारा ध्यान भोजन पर नही होता हम स्वाद ठीक से महसूस नही कर पाते। हम प्रयास करे भोजन पर ध्यान देने का । ये ध्यान की प्रारम्भिक अवस्थायें हैं । 
हम तीन बार ऊँ का ऊँकार करे तो उससे भी ध्यान लगता है। जिन्होने ये प्रयोग अपनी कक्षाओ में किए उन्होने बताया कि कक्षा में अच्छा अनुशासन बन गया बच्चे ध्यान से सुनने लग गए। संयम भी मन को विकसित और प्रेरित करता हैं । वाणी का संयम, खानपान पर संयम आदि को स्वभाव बनाने से हम मन को विकसित कर पावेगे। सहन करने की शक्ति बढ़ाना भी मन का विकास हैं। सुनने की क्षमता का विकास करना भी मन का विकास हैं। हर व्यक्ति के अंदर बुराई और अच्छाई दोनो होती हैं। हम खेल, व्यायाम, येाग के माध्यम से विद्यार्थीयों में एकाग्रता का विकास कर सकते हैं। 

विज्ञानमय कोष  - 

 शरीर, प्राण, मन, बुद्धि, आत्मा से जुड़े हुए ये पाॅच कोष हैं । विज्ञानमय कोष बुद्धि से जुड़ा हुआ हैं। शरीर से अन्नमय कोष, प्राणमय कोष प्राण से जुड़ा हैं,। जैसे जैसे हम अन्नमय कोष से आनंदमय कोष की ओर जाते हैं तो हम स्थूल से सूक्ष्म की ओर जाते हैं । विज्ञानमय कोष मनोमय कोष से भी अधिक परिष्कृत हैं। विज्ञानमय कोष बुद्धि पर आधारित हैं, यह किसी चीज पर अवलंबित नही होता। जिस प्रकार मन किसी पर अवलंबित नही हैं वैसे ही विज्ञानमय कोष भी किसी पर अवलंबित नही होता। बुद्धि का प्रमुख कार्य होता हैं जानना। जानने के लिए हम निरीक्षण, परिक्षण, संश्लेषण, विश्लेषण, तर्क आदि करते हैं । लेकिन बुद्धि यह सब करती क्यो हैं? प्राचीन काल में विज्ञानमय कोष को बहुत महत्व दिया गया था। व्यक्ति विवेकपूर्ण निर्णय कर सके इसलिए विज्ञानमय कोष का विकास जरूरी हैं। ये पंचकोष दिर्घवृत्ताकार होते हैं , इनको अखण्ड मण्डलाकार कहा गया हैं । ये पंचकोष संकेन्द्री वृत्त न होकर आपस में जुड़े होते हैं। बुद्धि मन से भी जुड़ी हुई हैं । मन द्वन्दात्मक होता हैं लेकिन बुद्धि निश्चयात्मक होती हैं। हम बोलचाल में कहते हैं हमको मन की सुननी चाहिए बुद्धि की नही लेकिन मन को अच्छा रखना होगा। बुद्धि विवेकपूर्ण निर्णय कर सके इसके लिए मन का स्वस्थ होना आवश्यक हैं , इसीलिए क्रम में भी मनोमय कोष के बाद विज्ञानमय कोष को रखा गया हैं। बुद्धि को उचित बनाने के लिए मन को एकाग्रचित्त, शांत , अनासक्त बनाना होगा। शांत, एकाग्रचित्त, अनासक्त इन शब्दों को उल्टे क्रम में सोचते हैं। व्यक्ति का मन अनासक्तिपूर्ण होना बहुत मुश्किल होता हैं , हमारी शिक्षा व्यवस्था भी व्यक्ति को आसक्ति की ओर ले जा रही हैं। बुद्धि को तेजस्वी, तीक्ष्ण,सूक्ष्म, ग्रहणशील बनाने के लिए मन का एकाग्र, शांत होना बहुत आवश्यक ऐसा हमारे शास्त्रों में कहा गया हैं। शास्त्रों में बुद्धि के प्रकार बतायें गए हैं -
1. प्रतिभा - प्रज्ञा, मेधा, धी
जैसे मेरे विद्यालय में एक बालिका हैं जो गृहकार्य के साथ पढ़ाई में भी अच्छा करती हैं । प्रतिभाशाली बुद्धि सभी कामों में प्रवीण बनाती हैं।
प्रज्ञावान व्यक्ति के लिए गीता में बहुत कुछ कहा गया हैं ।
मेधावान, धीरवान व्यक्तित्व भी शास्त्रों मे बताए गए हैं। बुद्धि को सत्य असत्य का ज्ञान होता हैं पर मन इसमें गड़बड़ कर सकता हैं, बुद्धि पक्षपातरहित होती हैं एवं न्यायपूर्ण व्यवहार करने को प्रेरित करती हैं। इसलिए मनोनिष्ठ की जगह बुद्धिनिष्ठ व्यवहार उचित माना गया हैं। अब प्रश्न यह उठता हैं कि बुद्धि का विकास कैसे किया जाये? हमारे शास्त्र इसके लिए कुछ निर्देश देते हैं।
सबसे पहले कहा गया हैं ग्रहण करने की शक्ति का विकास करना। आज व्यक्ति किसी की सुनना पसंद नही करता हैं जिससे बुद्धि का विकास अवरूद्ध होता हैं। ग्रहणशीलता के बाद धारणशीलता भी होनी चाहिए। जैसे घड़ा अगर फूटा हैं तो उसमें पानी भरने के बाद भी वह बह जायेगा। धारण की गई बात स्मृति में जाती हैं । स्मृति शक्ति के विकास के लिए ग्रहणशीलता, धारणशीलता, के साथ अभ्यास आवश्यक हैं। यदि हमारी बुद्धि तीक्ष्ण हैं तो कम अभ्यास में भी स्मृति में बातें आ जाती हैं । इसके अलावा मैं कल्पना शक्ति के विकास को भी महत्वपूर्ण मानता हूॅ, कल्पनाशक्ति से ही नवाचार हो सकते हैं । हमारे राष्ट्रपति ए.पी.जे. कलाम कहते थे - सपने वे होते हैं जो सोने ही नही दे। विद्यालयो  में बहुत से बच्चे कल्पनाशील होते हैं परन्तु उनको कल्पनाशीलता के अनुकूल वातावरण नही मिल पाता हैं। पालक भी बच्चों को केवल किताबों में उलझाकर रटन प्रणाली अपनाने को कहते हैं। वर्तमान परीक्षा प्रणाली भी बच्चों की कल्पनाशक्ति के विकास में इतनी सहायक नही हैं। 
इसके बाद निरीक्षण क्षमता की बात करते हैं, जैसे - अलग अलग व्यक्ति के देखने का ढंग अलग अलग होता हैं। बचपन में हम दो चित्रों में अन्तर खोजते थे जिसकी निरीक्षण शक्ति अच्छी होती थी वो ज्यादा अंतर खोज लेते थे। निरीक्षण के साथ परीक्षण शक्ति भी अच्छी होनी चाहिए। परीक्षण क्षमता विज्ञानमय कोष का महत्वपूर्ण अंग हैं । इसके अलावा तर्कशक्ति का विकास भी होना चाहिए। बुद्धि तर्कशील होनी चाहिए। हमारे यहाॅ तर्क को वाद विवाद से जोड़ लिया जाता हैं, प्राचीन काल में शास्त्रार्थ बोला जाता था। तर्कशील व्यक्ति अंधानुकरण नही करता हैं। व्यक्ति की निरीक्षण, परीक्षण और तर्क क्षमता अच्छी हो तो उसकी अनुमान क्षमता भी बढ़ती हैं। जीवन में हमारे पास हर समय मापन के यंत्र नही होते ऐसे समय में हमारी अनुमान क्षमता ही काम आती हैं। इसके बाद विश्लेषण की बात करते हैं - विश्लेषण का अर्थ होता हैं वस्तु/विचार के घटको को अलग अलग करके अध्ययन करना। इसके बाद संश्लेषण की बात करते हैं निकाय के भागो को अलग अलग समझना परन्तु एक निकाय के रूप में बात करना संश्लेषण की श्रेणी में आता हैं। 
आज की हमारी शिक्षा पद्धति में हम देख रहे हैं कि बच्चे 90-99 प्रतिशत अंक लाते हैं लेकिन उनमें विश्लेषण क्षमता का अभाव दिखाई देता हैं। वो केवल स्मृति के आधार पर परीक्षा में अंक ले आते हैं लेकिन विश्लेषण क्षमता का विकास नही कर पाते।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो 18 अध्याय कहे वो किसी न किसी योग पर आधारित थे। इतनी बाते सुनकर अर्जुन ने श्रीकृष्ण ने कहा इतने विशाल ज्ञान को मैं कैसे ग्रहण और प्रयोग कर पाऊगा। तब श्रीकृष्ण ने कहा था ‘‘ असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं , अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ।। संक्षेप में अर्थ अभ्यास से सब संभव हैं। आज विद्यालयो मे अभ्यास कार्य भी व्यवस्थित रूप से नही दिया जाता । हमारे यहाॅ बहुत से प्रोजेक्ट लर्न बाय फन, एक्टिविटी बेस लर्निंग आदि आते रहते हैं। अध्ययन के साथ अध्यापन की पद्धति भी महत्व की होती हैं। आज के अध्यापन में सर्वाधिक कमी जो मुझे दिखती हैं वह हैं विद्यार्थियों में जिज्ञासु प्रवृत्ति का कम होना। आजकल शिक्षण प्रक्रिया वन वे हो गई हैं । बुद्धि विकास के लिए जिज्ञासु होना बहुत जरूरी हैं। यह भी कहा गया हैं कि जैसे जैसे ज्ञान बढ़ता हैं अज्ञानता भी बढ़ती हैं। इसका आशय यह हैं कि जैसे जैसे ज्ञान बढ़ता हैं जिज्ञासु प्रवृत्ति बढ़ती हैं और व्यक्ति को लगता हैं कि मुझे अभी बहुत कुछ ज्ञान नही हैं। 
श्रद्धावान् लब्धे ज्ञानम् परन्तु वर्तमान समय में ज्ञान और श्रद्धा का संबंध दिखाई नही देता । कभी भारत में विद्या,चिकित्सा और भोजन निःशुल्क मिलता था आज शायद ये तीनो चीजे ही सबसे महंगी हैं, तत्पर व्यक्ति ही ज्ञान को प्राप्त करता हैं। इन्द्रिय संयम से सही ज्ञान प्राप्त होता हैं। इसलिए कहा गया हैं कि मनोमय कोष के सम्यक् विकास से ही विज्ञानमय कोष का विकास हो सकता हैं। अन्न के आनंद से आध्यात्मिक आनंद की ओर बड़ना ही विकास को इंगित करता हैं।

आनंदमय कोष  - 

 आनन्द जीवन की सर्वश्रेष्ठ अवस्था हैं , अन्नमय कोष से इस चरम सीमा या अंतिम अवस्था तक की यात्रा पर विचार करते हैं ।  जन्म से मृत्यु तक मनुष्य जो सीखता हैं उसका परिणाम आनंदमय अवस्था हैं। आनंद से जीने के लिए व्यक्ति की सोच व सोचने का तरीका अलग अलग हो सकता हैं। सुख प्राप्ति का अर्थ व्यक्ति अलग अलग निकाल सकता हैं । पंचकोष के संदर्भ में हम बात करे तो इस विषय की गहराई अलग से दिखाई देगी , मैं इस विषय की गहराई तक आपको ले जाने हेतु प्रयास नही करूगा मैं तो केवल आपको पुनःस्मरण कराने का प्रयास करूगा। अपने को जान लेना, पहचान लेना, अपने बारे में पुरी समझ कर लेना आनंदमय कोष का विकास होगा। एजुकेशन टर्मिनाॅलिजी में केपिसीटी, केपीबिलिटी, स्ट्रेन्थ को इकट्ठे कर लेने से मनुष्य आनंदमय कोष तक जायेगा। व्यक्ति दूसरों को समझने की ज्यादा कोशिश करता हैं बजायें स्वयं को समझने के। व्यक्ति को अपने अंतिम लक्ष्य का पता नही होता हैं। मेरी संतान पर अधिकार मुझसे ज्यादा विद्यालय, समाज का हैं इस दृष्टि से समझ लेना आनंदमय कोष की प्राप्ति हैं। 
अन्नमय कोष , प्राणमय कोष, मनोमय कोष, विज्ञानमय कोष को पूर्णरूपेण विकसित कर पाते हैं तो हम स्वतः आनंदमय कोष को पा जाते हैं कुछ भी यत्न करने की आवश्यकता नही होती। भारत के अंदर जाॅयफुल लर्निंग, चाइल्ड सेन्टर्ड एजुकेशन, एक्टिविटी बेस्ट एजुकेशन जैसे विषय चल रहे हैं इन सबका उद्देश्य आनंदमय कोष को प्राप्त करना होगा। शिक्षा का कार्य आवरण को हटाना हैं। विद्यार्थी को स्वायत्तता दे देना और अध्यापक को उसके स्वयं की दृष्टि से समझ पाने की क्षमता से आनंदमय कोष तक जाया जा सकता हैं। विज्ञानमय कोष के हटते ही आत्मा का परमात्मा से मिलन हो जाता हैं । जो स्वयं को पहचान गया उसने शिक्षा प्राप्त कर ली ऐसा माना जाएगा। हमारे यहाॅ अहं ब्रहमास्मि, शिवो अहं ऐसी बाते कही गई हैं। हमारे यहाॅ आत्मा को परमात्मा का छोटा रूप माना गया हैं। ऐ ऐसी बाते हैं जिससे आपको लग रहा होगा कि हम सन्यास आश्रम में पहुॅच गये हैं। शिक्षा में इसका अर्थ ऐसा नही हैं शिक्षा में अपने बारे में जानकारी लेना , अपनी समस्याओ का स्वयं समाधान करना ऐसा अर्थ लगाया जा सकता हैं । 
स्कूली शिक्षा से विश्वविद्यालय शिक्षा तक अंतिम लक्ष्य आनंदमय कोष तक पहुॅचना हैं। अब हम आनंद क्या हैं इस पर थोड़ा विचार करे। कुछ व्यक्ति अहंकार पूर्ति में आनंद अनुभव करते हैं, कुछ व्यक्ति शक्ति प्रयोग को आनंद मानते हैं, क्या यह आनंद हैं ? कोरोना काल में सही आनंद अनुभूति का मार्ग प्रशस्त कर दिया। मैने यह अनुभव किया कि मेरे पास बहुत धनराशि थी पर मैं उसका उपयोग नही कर सकता था, मेरे पास सभी सुविधायें थी पर पहले की तरह उपयोग नही कर पाता था। मेरे पास धैर्य, सहनशीलता जैसे गुण थे जो कही आवरण से ढंक गए थे जिसको कोरोना ने पुनः अनावरित कर दिए। अब समय हैं इनको आगे बढ़ाने का। मन की तृष्णा, बुद्धि के अहंकार की पूर्ति को कुछ लोग आनंद मानते हैं। कर्मइन्द्रियो और ज्ञानइन्द्रियों को पूर्ण रूप से सात्विक बनाने से आनंदमय कोष में जाते हैं। 
मन की तृष्णा भी अलग अलग होती हैं मन की तृष्णा भगतसिंह के अंदर थी, आतंकवादियों में भी होती हैं परन्तु दोनो में अंतर हैं। आनंदमय कोष जिसका विकसित हो जाता हैं वो सबसे ऊपर की अवस्था में आ जाता हैं। ब्रहम को पहचानना, ब्रहम को जगाना आनंदमय कोष का विस्तार हैं। हमे कुछ संस्कार आनुवांशिक रूप से मिलते हैं, कुछ संस्कार हम सीखते हैं। आनंदमय कोष की प्राप्ति के लिए शिक्षण संस्थाओं में कुछ कार्य करने होगे - निःस्वार्थ भाव, सेवाभाव,ध्यान, निरपेक्ष भाव से कार्य करना।  प्रेम स्वरूप, आनंद स्वरूप सौन्दर्यबोध होना चाहिए। मैं कुछ उदाहरण देता हूॅ - 
एक लड़की छोटे से लड़के को कंधे पर उठाकर चल रही थी लोगो ने पूछा बोझ नही लग रहा ? तो लड़की ने कहा मेरा भाई हैं। कहने का मतलब बोझ किसी से लगता हैं किसी से नही लगता यह भावना पर आधारित हैं । माॅ को अपने बच्चे का बोझ कभी नही लगता। ये प्रेम की भावना ही आनंद हैं। हम ईश्वर की भक्ति, भावना से करते हैं आनंद हैं। हम किसी भी विषय को पढ़ा रहे हैं और उसमें आनंद न आये तो उसमें लक्ष्य प्राप्ति या आउटकम प्राप्त नही होगा। एक का कष्ट जब दूसरा अनुभूत करने लगे यह भाव शिक्षा के माध्यम से आने चाहिए। 
 चारो कोषों के विकास के लिए शैक्षणिक संस्थाओ को सेवा प्रकल्पों के रूप में कार्य करना होगा। विनम्रता, सेवा जैसे भाव शैक्षणिक संस्थाओ में दिए जाने चाहिए। आज चीन ने सीमा पर, वायरस के कारण परेशान किया हैं तो हम सेवा भाव से उसको उत्तर दे सकते हैं। समर्पण भाव जब मानव में जाग्रत हो जाता हैं तो यह विश्व शांति के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं । भारत की मान्यता ही हैं सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित् दुःख भाव भवेत्। इन भावो से अन्नमय कोष से आनंदमय कोष की ओर जाना शिक्षा का लक्ष्य होना चाहिए 
                           " मैं आप सभी का धन्यवाद करता हैं  "


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